कितनी आम सी बात है,
रोज़ सुनी है हमने|
कभी टीवी पे चल रहे किसी सीरियल ने तो कभी साथियों के मज़ाक ने हमारी इस हक़ीकत से मुलाकात करा दी,
बस ये ना पता था की जिस बात को मज़ाक समझा था हमने वो स्च्चाई का एक ऐसा आईना है जिसमे हम इस हक़ीकत का टेलएकास्ट रोज़ देखेंगे|
 
आज कई साल बीत गये है,
और हमने जीनेके नये तारिके भी सीख लिए है,
बेटी बन गई बहू और लो हो गई एक नई गुटार-गु शुरू,
कभी मोहल्ले वालों ने तो कभी रिश्तेदारों ने,
हर किसी ने हमेज़िम्मेदारियों के एक नई लिस्ट थमा दी,
बस ये समाज नही आ रहा की इन सब के बीच ख़ुशियो और सपनो की लिस्ट कहा गुम गई|
 
“बहू तुम्हे कम बोलना है, बहू तुम्हे धीरे चलना है, धीरे  हसना है, ” ऐसे कई नियमो से हमारी मुलाकात हो गई
बस ये ना समाज आया की इन सब के बीच हमारी पहचान क्यूँ छुपा दी गई|
 
चलो ये माना की बहू को एक नया परिवार बनाना है ,
और दो परिवारों को मिला के चलाना|
चलो हमने अपना नाम छोड़ा,
बचपन का आँगन भी छोड़ा,
और चलो अपने कुछ सपनो को भी तोड़ा,
इन सब के बीच हमने बस यही सोचा ,
की नया परिवार अपनाने के लिए पुराना घरोंदा क्यू छोड़ा?
क्या ज़रूरी है हर लड़की के लिए ये करना?
एक नई जिंदगी के लिए पुराने रिश्तों से नाता तोड़ना,
माना की हर किसी की किस्मत ऐसी नही होती,
पर त्याग की तस्वीर तो हर लड़की को रंगनी ही होती है,
और ये सब करने से क्या ये पक्का हो जाएगा की नया परिवार हमे बेटी की तरह अपनाएगा,
क्यूंकी हालात देख के तो ऐसा ही लगता है की बहू से बेटी बनाने का दिया यूँ ही धीरे-धीरे भुज जाएगा,
ऐसा नही है की सब कुछ बुरा ही है,
और हम बिल्कुल बेसहारा ही है|
 
सोचा तो यही था की हमे नये रिश्तों का संग मिलेगा और हमारे सपनों को नया रंग मीलेगा,
ये तो किसी ने बताया ही नही की नये रिश्तों का संग इतने बेरंग मीलेगा,
ये तो जीवन का चक्र है जो चलता ही रहेगा,
और बेटी से बहू बनने का सफ़र यूँही आगे बढ़ता रहेगा  |
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